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भारती हाथी की विशेषता

  • हाथी जमीन पर रहने वाला सबसे बड़ा स्तनपायी प्राणी है.

  • मुख्य रूप से हाथी एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के बड़े बड़े मैदानों में पाए जाते हैं. 

  • हाथी की तीन प्रजातियाँ होती है. उनमें से केवल दो प्रजातियाँ ही जीवित हैं : ऍलिफ़स तथा लॉक्सोडॉण्टा तथा तीसरी प्रजाति मॅमथस विलुप्त हो चुकी है. 

  • हाथी की त्वचा स्लेटी रंग की होती है. जिस पर झुर्रियां पायी जाती है. एक व्यस्क हाथी की त्वचा की मोटाई 3 सेंटीमीटर तक होती है. आश्चर्य की बात यह है कि यह त्वचा बेहद कोमल होती है और मक्खी, मच्छर, कीड़े, मकोड़े आदि इसे आसानी से भेद सकते हैं. कुछ हाथी सफ़ेद रंग के भी होते हैं जिन्हें एल्बिनो कहा जाता है. इन हाथियों को पवित्र माना जाता है और इनसे कोई काम नहीं लिया जाता. 

  • सभी प्रजातियों में हाथी दांत पाए जाते हैं जिनकी सहायता से हाथी सख्त, खनिज युक्त मिट्टी को खाने से पहले तोड़ता है. हाथी में लगभग 28 दांत होते हैं जिनमें से दो छेदक दांत लम्बे होकर उसके मुंह से बाहर की तरफ निकले होते हैं. जीवन पर्यंत ये बढ़ते रहते हैं. पेड़ों की झाड़ियों को उखाड़ने और अन्य हाथियों से लड़ाई करने में ये दांत काम आते हैं. 

  • हाथी के पैर मोटे स्तंभों या खम्बों की तरह होते हैं. खड़े रहने के लिए इन्हें बहुत ही कम शक्ति की आवश्यकता होती है. हाथी खड़े-खड़े ही आराम करते हैं. ये अपने कानों के द्वारा ऊष्मा का विकिरण करते हैं.

  • हाथी का सबसे विशेष अंग उसकी सूंड होती है. यह हाथी के नाक और उसके ऊपरी होठ का ट्यूब जैसी आकृति में विस्तार है. सूंड की लम्बाई 10 फीट तक हो सकती है. ऊपर से नीचे की ओर सूंड की चौड़ाई कम होती जाती है और आखिर में छोटा सा छिद्र रह जाता है. हाथी की सूंड नमक, कैल्शियम और डेन्टाइन से बनी होती है. शरीर को ठंडा रखने के लिए हाथी अपनी सूंड की मदद से ही कीचड़ और मिट्टी अपने शरीर पर डालता है. जब हाथी सतर्क होता है तो अपनी सूंड से चिंगाड़ने की आवाज़ निकालता है. हाथी की सूंड उसके हाथ की तरह उपयोग में आती है. इसकी सहायता से यह एक सिक्के जैसी छोटी वस्तु से लेकर 600 पौंड ( 272 kg ) वजन तक के लकड़ी के गट्ठर भी आसानी से उठा लेता है. गंध और श्वास के लिए भी सूंड ही काम आती है. 

  • हाथी मुख्य रूप से घास, पेड़ों की छाल और पत्तियां खाता है. हाथी 160 - 350 पौंड अर्थात 72 से 158 किलोग्राम भोजन रोज लेता है. घास और शाखाओं से पत्तियां तोड़ने में हाथी अपनी सूंड का उपयोग करता है और सूंड की मदद से ही भोजन मुंह में डालता है. पानी पीने के लिए हाथी पहले सूंड में पानी भरता है फिर इसे फुहार के द्वारा मुंह में छोड़ता है.

  • हाथी एक सामाजिक प्राणी है और हाथी समूह में रहते हैं. झुण्ड में ज्यादातर मादाएं होती है और बुजुर्ग तथा प्रभावशाली मादा ही समूह का नेतृत्व करती है. नर हाथी जब तक लैंगिक रूप से प्रोढ़ नहीं होता वह भी इसी समूह का हिस्सा होता है. लैंगिक रूप से प्रोढ़ हो जाने पर उसे समूह से निकाल दिया जाता है. झुण्ड की सभी मादा हाथी बहुत एकता से रहती है और एक दूसरे की सुरक्षा भी करती हैं. जब ये भोजन और पानी की खोज में निकलती है तो झुण्ड के सदस्यों से संपर्क में रहने के लिए एक कम डेसिबल की आवाज़ जिसे मनुष्य के कान नहीं सुन सकते का प्रयोग करती हैं. 

  • नर हाथी वनों में अकेले ही घूमते हैं या फिर अन्य नर हाथियों के साथ समूह बना लेते हैं. 

  • मादा हाथी को गाय कहा जाता है. नर हाथियों को बैल कहा जाता है.

  • हाथी का गर्भकाल जमीनी जीवों में सबसे लम्बा 22 महीनों का होता है. अधिकांशतः बच्चे वर्षा ऋतुके अंतिम दिनों में पैदा होते हैं. हाथी के बच्चों को बछड़ा/बछड़ी कहा जाता है और जन्म के समय उनका वजन 200 पौंड ( 90 किलोग्राम ) होता है. इसकी ऊंचाई 1 मीटर तक होती है. नर चौदह से पंद्रह वर्ष की आयु में यौन परिपक्वता पा लेते हैं और मादा 15-16 वर्ष की आयु में पहले बच्चे को जन्म देती है. 

  • हाथी कुशाग्र बुद्धि होते हैं. इनकी दृष्टि कमजोर होती है. श्रवण शक्ति अच्छी और घ्राण शक्ति बहुत अच्छी होती है. पानी की गंध को यह 4.5 किलोमीटर की दूरी से ही सूंघ सकता है. हाथी रोजाना 70 से ज्यादा तरह की ध्वनियां तथा 160 दृश्य व स्पर्शनीय संकेतों का उपयोग करता है. 

  • जब हाथी गुस्से या डर में होता है तो थोड़ी दूरी तक वह 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ता है. लम्बी दूरी की यात्रा के समय हाथियों का झुण्ड 16 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलता है. 

  • हाथी को पानी बहुत पसंद होता है. इन्हें अक्सर नदियों और तालाबों में नहाते हुए देखा जा सकता है. हाथी अच्छे तैराक भी होते हैं. ये नियमित रूप से नहाते हैं.

  • हाथी की औसत आयु 70 वर्ष होती है.

  • हाथी एक संकट ग्रस्त प्रजाति है. पर्यावास के विनाश और मनुष्य द्वारा शोषण के कारण हाथी विलुप्प्त प्राय है. हाथी दांतों की वजह से इनका अवैध शिकार किया जाता है.


 

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